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छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती कब मनाई जाती है

 शिवाजी जयंती छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती मनाने के लिए मनाई जाती है, जिनका जन्म 19 फरवरी, 1630 को हुआ था। वह एक महान मराठा योद्धा थे और भारत के कई हिस्सों में, विशेष रूप से महाराष्ट्र में उन्हें एक नायक माना जाता है। उन्होंने मराठा साम्राज्य की स्थापना की और अपनी सैन्य रणनीति, प्रशासनिक कौशल और प्रगतिशील नीतियों के लिए जाने जाते थे। शिवाजी जयंती हर साल 19 फरवरी को महाराष्ट्र और भारत के अन्य हिस्सों में बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती है जहां मराठी भाषी समुदाय रहते हैं। यह महाराष्ट्र में एक सार्वजनिक अवकाश है, और लोग विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों, जुलूसों का आयोजन करके और शिवाजी महाराज की विरासत को श्रद्धांजलि देकर इस दिन को मनाते हैं। शिवाजी महाराज, जिन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम से भी जाना जाता है, 17वीं शताब्दी के दौरान भारत में मराठा साम्राज्य के एक महान योद्धा और नेता थे। उन्हें भारतीय इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण शख्सियतों में से एक माना जाता है और महाराष्ट्र में एक नायक के रूप में सम्मानित किया जाता है। शिवाजी महाराज का जन्म 1627 में महाराष्ट्र के पुणे जिले के शिवनेरी ...

आलस्य मानव का बहुत बड़ा दुश्मन (निबंध लेखन )

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|   आलस्य मानव का बहुत बड़ा दुश्मन मनुष्य स्वभाव में आलस का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है | संत कबीर दास जी ने कहा है ही  है |  कि काल करे सो आज कर आज करे सो अब पल में प्रलय हो जाएगी बहुरि करेगा कब हर मनुष्य सोचता है कि अपना काम तो वह कभी भी कर सकता है पर ऐसा सोचते हुए उसका समय निकल जाता है |  समझदार मनुष्य इस बात को जानते हैं इसलिए ही वह विकास के पथ पर चलते हैं अक्सर लोग अपनी सफलता और निराशा को लेकर भाग्य को कोसते हैं | जबकि वास्तविकता यह है कि विकास का समय हर आदमी के पास आता है | और जो अपने ज्ञान और विवेक से उसका लाभ उठाते हैं|  उनकी पीढ़ियों का भी भविष्य सुधर जाता है |  संसार में सफल और प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी उद्योगपति तथा प्रतिष्ठा भाव लोगों की संख्या आम लोगों से कम होती है|  इसका कारण यह है कि सभी लोग समय का महत्व नहीं समझते और आलस के भाव से ग्रसित रहते हैं। समय का सदुपयोग करें हमारे जीवन के साथ जो अनवरत चलता रहता है वह है समय हमारा समय और जीवन एक साथ प्रति क्षण नष्ट हो रहे हैं |  हमारे जीवन के साथ जिस चीज का सम्मान होना चाहिए वह...

माता सती और शक्तिपीठ

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माता सती  और शक्तिपीठ    अंत   में  –     दोस्तों   इस   आर्टिकल   में   मैंने   आपको   माता सती  और शक्तिपीठ के बारे में जानकारी प्राप्त कराया  अब   मुझे   उम्मीद   है   की   आपको   इस   आर्टिकल   को   पढ़ने   के   बाद   कोई   कन्फूज़न   नहीं   होगा ,  फिर   भी   अगर   आप   मुझसे   कोई   सवाल   करना   चाहते   हैं ,  तो   मुझे   कमेंट   में   बताईये    आर्टिकल   अच्छा   लगा   तो   अपने   मित्रो   के   साथ   भी   शेयर  करे |  धन्यवाद 

क्या पुनर्जन्म होता है ?

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  पुनर्जन्म एक सुनिश्चित सत्य पुनर्जन्म को लेकर लोगों  में सदा से ही कौतुक- कुतूहल रहा है | कुछ लोग इसे  चमत्कार मानते हैं, तो कुछ लोग इसे मिथ्या मानते हैं | विभिन्न शास्त्रों में पुनर्जन्म संबंधित अनेक आख्यान  वह प्रमाण है, जो यह प्रमाणित करते हैं कि पुनर्जन्म न तो कोई चमत्कार है, ना ही कोई अंधविश्वास | जो पैदा हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है, पर मृत्यु जीवात्मा के आगे की यात्रा का अंत नहीं है|  जीवन की अतृप्त वासनाओं कामनाएं , और कर्मफल ही  उसके जन्म व पुनर्जन्म के कारण है|  जब व्यक्ति की वासनाएं , कामनाएं, कर्मसंस्कार पूर्णत: नष्ट हो जाते हैं तभी जीवन -मरण वह पुनर्जन्म के चक्रव्यू से मुक्त हो पाता है|  हाँ  यह बात दीगर है कि किसी- किसी को अपने पुनर्जन्म की स्मृतियां नए जीवन में भी मानस पटल पर आती रहती है पर  सबकी अपने पुनर्जन्म की यादों का स्मरण हो जाए , यह आवश्यक भी नहीं है|  पुनर्जन्म की ऐसी अनेक घटनाएं अक्सर कहीं ना कहीं घटती हुई दिखाई पड़ती है, या सुनाई पड़ती है|  ऐसी ही एक घटना नासिक के 10 किलोमीटर उत्तर पूर्व के एक ...

सुख का मंत्र

  लोककथा :सुख का मंत्र पुराने समय में एक संत अपने शिष्यों के साथ एक गांव से गुजर रहे थे |  रास्ते में उन्हें एक स्वर्ण मुद्रा मिली संत ने मुद्रा को उठाया और शिष्य से कहा कि सोने का यह सिक्का सबसे जरूरतमंद व्यक्ति को देंगे |  शिष्यों ने सोचा कि अगर यह सिक्का उन्हें मिलता तो वह मनपसंद भोजन कर सकते थे, लेकिन गुरु के सामने किसी ने कुछ नहीं कहा रात होने पर संत अपने शिष्यों के साथ गांव के बाहर पड़ाव डाल कर रुक गए |अगले दिन सुबह उन्होंने देखा कि उस क्षेत्र का राजा अपनी विशाल सेना के साथ पड़ोसी राज्य पर आक्रमण करने के लिए जा रहा है |  अपने शिष्यों के साथ राजा के पास गए | मंत्री ने राजा को संत के विषय में बताया तो राजा तुरंत ही अपने से नीचे उतरा और संत को प्रणाम किया |  संत ने अपनी झोली में से स्वर्ण मुद्रा निकालकर राजा को दे दी |  सिक्का देखकर राजा हैरान हो गया , उसने पूछा कि गुरुदेव सिक्का मुझे क्यों दे रहे हैं |  संत ने कहा कि यह स्वर्ण मुद्रा मुझे मार्ग में मिली थी |  मैंने सोचा कि यह सबसे जरूरतमंद व्यक्ति को दूंगा |  आपके पास अपार धन-संपत्ति है ....

ऐसे शुरू हुआ विक्रम संवत कैलेंडर

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  राजा विक्रमादित्य के नाम से भारत में विक्रम संवत के अनुसार अनुसार कैलेंडर की शुरुआत हुई सुप्रसिद्ध विद्वान आर्यभट्ट के अनुसार ईसा  से 3102 वर्ष पूर्व हमारे यहां कलियुगी  सवंत शुरू किया गया था ,जिसे आधुनिक अर्थ में विश्व का प्रथम कैलेंडर कहा जा सकता है |  प्राचीन भारत में कालचक्र को विभिन्न ऋतुओ  में बांटने की परंपरा थी |  सबसे छोटा खंड ' पल ' होता था |  इसके बाद दिन, माह, वर्ष ,दिव्य वर्ष, युग, महायुग मन्वंतर तथा कल्प आदि होते थे इसके लिए निश्चित और विस्तृत कालगणना थी |  सुप्रसिद्ध विद्वान आर्यभट्ट के अनुसार ईसा  310 2 वर्ष पूर्व हमारे यहां  कलियुगी  सवंत  शुरू किया गया था ,जिसे आधुनिक अर्थ में विश्व का प्रथम कैलेंडर कहा जा सकता है |  चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के शिलालेखों में भी इसका उल्लेख मिलता है | इसके बाद ईसा से 57 वर्ष । पूर्व सम्राट विक्रमादित्य ने अपने नाम से नया कैलेंडर शुरू किया ,जिसे विक्रम - सवंत कहते हैं |  हमारे यहां जन साधारण में सर्वाधिक लोकप्रिय यही कैलेंडर है | हमारे उत्सव और पर्व आद...