सुख का मंत्र

 लोककथा :सुख का मंत्र

पुराने समय में एक संत अपने शिष्यों के साथ एक गांव से गुजर रहे थे |  रास्ते में उन्हें एक स्वर्ण मुद्रा मिली संत ने मुद्रा को उठाया और शिष्य से कहा कि सोने का यह सिक्का सबसे जरूरतमंद व्यक्ति को देंगे |  शिष्यों ने सोचा कि अगर यह सिक्का उन्हें मिलता तो वह मनपसंद भोजन कर सकते थे, लेकिन गुरु के सामने किसी ने कुछ नहीं कहा रात होने पर संत अपने शिष्यों के साथ गांव के बाहर पड़ाव डाल कर रुक गए |अगले दिन सुबह उन्होंने देखा कि उस क्षेत्र का राजा अपनी विशाल सेना के साथ पड़ोसी राज्य पर आक्रमण करने के लिए जा रहा है | 

अपने शिष्यों के साथ राजा के पास गए | मंत्री ने राजा को संत के विषय में बताया तो राजा तुरंत ही अपने से नीचे उतरा और संत को प्रणाम किया | 

संत ने अपनी झोली में से स्वर्ण मुद्रा निकालकर राजा को दे दी |  सिक्का देखकर राजा हैरान हो गया , उसने पूछा कि गुरुदेव सिक्का मुझे क्यों दे रहे हैं |  संत ने कहा कि यह स्वर्ण मुद्रा मुझे मार्ग में मिली थी |  मैंने सोचा कि यह सबसे जरूरतमंद व्यक्ति को दूंगा | 

आपके पास अपार धन-संपत्ति है .बड़ा राज्य है, फिर भी आप पड़ोसी राज्य पर अधिकार करना चाहते हैं ,इसलिए इतनी विशाल सेना लेकर पड़ोसी राज्य पर आक्रमण करने जा रहे हैं |

आपके लालच का कोई अंत नहीं है ,आपसे ज्यादा जरूरतमंद कोई और नहीं है, इसलिए यह सिक्का आपको दे रहा हूं | संत की यह बात सुनकर राजा को अपनी गलती का एहसास हो गया |  उसने संत से क्षमा मांगी और युद्ध का विचार त्याग कर अपनी सेना के साथ पुनः अपने राज्य लौट गया |

कथा की सीख

इस छोटी सी कथा किसी किया है -लालच की वजह से व्यक्ति की सोचने समझने की शक्ति खत्म हो जाती है | व्यक्ति को अच्छे बुरे का ध्यान नहीं रहता  है  | इस बुरी आदत से बचने पर ही हमारी कई परेशानियां खत्म हो सकती है | 

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